त्रिकोणीय मुकाबले में फंसी मालदा सीट क्या 2029 की तैयारी का मास्टर प्लान है नूर का

त्रिकोणीय मुकाबले में फंसी मालदा सीट क्या 2029 की तैयारी का मास्टर प्लान है नूर का

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त्रिकोणीय मुकाबले में फंसी मालदा सीट क्या 2029 की तैयारी का मास्टर प्लान है नूर का

पश्चिम बंगाल का मालदा क्षेत्र दुनिया भर में अपने खास रसीलेपन, सुगंध और मिठास के लिए प्रसिद्ध है। देश भर में मालदा आम के करोड़ों दीवाने होंगे। यह क्षेत्र आम नहीं है, बल्कि राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। मालदा जिला पश्चिम बंगाल में है, जो उत्तरी बंगाल और मुर्शिदाबाद बेल्ट में पड़ता है। यह सुंदर इलाका किसी भी राजनीतिक दल का गढ़ नहीं बन सका है।

मालदा क्षेत्र भी तृणमूल कांग्रेस (TMC) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लिए राज्य में जीत की तैयारी में सुरक्षित नहीं है। हर सीट पर अलग-अलग मुकाबले हुए हैं। यह राज्य के एक छोटे से जिले में से है जहां कई सीटों पर त्रिकोणीय राजनीति देखने को मिलती है। TMC और BJP के अलावा कांग्रेस-वामपंथ दल भी चुनौती देते रहे हैं। लेकिन इस बार कांग्रेस चुनाव अकेले लड़ रही है। मालदा जिले की कुल 12 सीटें दो महत्वपूर्ण संसदीय क्षेत्रों (मालदा उत्तर और मालदा दक्षिण) में विभाजित हैं।

राजनीतिक संघर्षों पर चर्चा करने से पहले, यहाँ की सामाजिक व्यवस्था को देखें। यह क्षेत्र मुस्लिम बहुल है। मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका इस चुनाव में महत्वपूर्ण है। यहां के कई इलाकों में मुसलमानों की आबादी पचास प्रतिशत से अधिक है, और कुछ जगहों पर यह 60 से 70 प्रतिशत तक जा सकती है। यह मालदा उत्तर में हरिश्चंद्रपुर, रतुआ और मालदा दक्षिण में मानिकचक, इंग्लिश बाजार और कालियाचक में दिखाई देता है।

यहां कहा जाता है कि अगर मुस्लिम वोटर्स एकजुट रहते हैं, तो TMC या कांग्रेस जीत सकते हैं, लेकिन अगर वे अपने वोटों को बांटते हैं, तो बीजेपी जीत सकता है। यही कारण है कि प्रत्येक चुनाव में वोटों के ध्रुवीकरण या मुस्लिम वोटों के वितरण को लेकर व्यापक बहस होती है।

मालदा जिले के उत्तरी और मिश्रित आबादी वाले ग्रामीण इलाकों में मुस्लिम वोटर्स के अलावा राजबंशी, अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और आर्थिक रूप से कमजोर हिंदू वोटर्स अहम वोट बैंक हैं। BJP की चांचल, गज़ोल (SC) और हबीबपुर (ST) क्षेत्रों में संभावना रहती है। 2021 के चुनाव में बीजेपी ने गजोल और हबीबपुर जैसे निर्वाचन क्षेत्रों पर जीत हासिल की थी।

कांग्रेस की बात करते हुए, वह 2021 के विधानसभा चुनाव में अपना खाता नहीं खोला था, इसलिए वह इस बार अपना खाता बनाने और अपने प्रदर्शन को बेहतर बनाने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस ने केरल में सांसदों को टिकट नहीं दिया है, लेकिन पश्चिम बंगाल में पार्टी ने कई पूर्व सांसदों को चुनाव जीता है। कांग्रेस ने मालतीपुर विधानसभा सीट से मालदा उत्तर की पूर्व सांसद मौसम नूर को चुना है, जिससे मालदा जिले में कड़ा मुकाबला होगा। तृणमूल कांग्रेस ने पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की मजबूत पकड़ वाले क्षेत्र में दबदबा बनाया और मालदा जिले की 12 में से 8 सीटें जीत ली, जबकि कांग्रेस और CPI-M को एक भी सीट नहीं मिली। बीजेपी ने चार सीटों पर जीत हासिल की, जिसमें से तीन मालदा उत्तर क्षेत्र से थीं।

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लेकिन इस बार कांग्रेस ने क्षेत्र के प्रसिद्ध नेता, दिवंगत ABA गनी खान चौधरी के परिवार की देखभाल की। खान चौधरी की भतीजी मौसम नूर ने अपनी मां रूबी नूर की मृत्यु के बाद सुजापुर से विधायक बनकर सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया। नूर मालदा अब राज्य की राजनीति में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहती हैं क्योंकि वे उत्तर प्रदेश से दो बार सांसद रह चुकी हैं। पार्टी से जुड़े लोगों का कहना है कि नूर का मालतीपुर से चुनाव लड़ने का निर्णय ऐसा नहीं था। 2029 में होने वाले लोकसभा चुनावों को देखते हुए उन्होंने यह निर्णय लिया है।

ममता बनर्जी की पार्टी ने अभी अपने उम्मीदवार का नाम नहीं घोषित किया है, जबकि कांग्रेस ने मालतीपुर सीट से मौसम निकाल दिया है। भारतीय जनता पार्टी को भी उम्मीदवार चुनना बाकी है। लेकिन अगर तृणमूल कांग्रेस अपने वर्तमान विधायक और पार्टी जिलाध्यक्ष अब्दुर रहीम बक्शी को चुनाव में उतारती है तो मुकाबला दिलचस्प हो सकता है। नूर फिर से कांग्रेस में आने से पहले तृणमूल कांग्रेस में थीं।

2019 के लोकसभा चुनाव में मोसम नूर ने TMC के टिकट पर लड़ा था, लेकिन बीजेपी के प्रत्याशी खगेन मुर्मू से हार गए। लेकिन TMC ने उन्हें राज्यसभा भेजा। जब वह राज्यसभा भेजी गई, बीजेपी के नेता शुवेंदु अधिकारी तब TMC का सबसे बड़ा नेता था. उन्होंने नूर सहित कांग्रेस के कई नेताओं को TMC में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

मौसम नूर पहले सुजापुर से चुनाव लड़ना चाहती थी, लेकिन स्थानीय भावना को देखते हुए उन्होंने मालतीपुर से चुनाव लड़ने का निर्णय लिया।

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नूर को मालतीपुर से चुनाव लड़ने के बीच बड़ी राहत मिली जब उनका समर्थन एक और प्रभावशाली दावेदार, पूर्व विधायक अल-बेरुनी ने किया। माना जाता है कि नूर 2029 के संसदीय चुनावों पर ध्यान देंगे, जबकि अल-बेरुनी विधानसभा चुनावों पर।

मालदा सीट परिसीमन के बाद उत्तर लोकसभा सीट के तहत आई है। 2011 में अब्दुर रहीम बक्शी ने रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (RSP) की पहली सीट जीती थी, जबकि 2016 में अल-बेरुनी जुल्कनरेन ने कांग्रेस की पहली सीट जीती थी। 2021 में RSP छोड़कर तृणमूल में फिर से विजयी हुए।

बंगाल का मालदा क्षेत्र आज भी किसी का गढ़ नहीं है। 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने मालदा उत्तर में मजबूत जीत हासिल की, जबकि कांग्रेस ने मालदा दक्षिण में जीत हासिल की। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी ऐसा ही मुकाबला होगा। BJP ने मालदा उत्तर सीट अपने पास बनाए रखी, जबकि कांग्रेस ने मालदा दक्षिण सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखा, क्योंकि वह मुस्लिम मतदाताओं के कारण पुरानी है। इस तरह के परिणाम बताते हैं कि मालदा में विभिन्न राजनीतिक दलों का दबदबा है।

परिणाम कृषि क्षेत्र में निरंतर बदलते रहे हैं। यदि मुस्लिम वोटर्स एकजुट होते हैं, तो TMC को फायदा हो सकता है और कांग्रेस भी लौट सकती है। बीजेपी को फायदा हो सकता है अगर वोटों को बंटाया जाता है, जिससे वह चार सीटें अधिक पा सकती है। मालदा उत्तर संसदीय सीट के तहत मालतीपुर है, जहां मुस्लिम वोटर्स के अलावा अन्य वोटर्स भी महत्वपूर्ण हैं। अब देखना होगा कि मौसम नूर मालतीपुर में जीत हासिल कर मालदा और बंगाल में पार्टी की कमी को दूर कर पाता है या नहीं।

Neha Mishra
Author: Neha Mishra

नेहा मिश्रा बीते कुछ वर्षों से डिजिटल मीडिया और पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय रूप से कार्य कर रही हैं। वह उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से ताल्लुक रखती हैं और उन्होंने अपनी शैक्षणिक योग्यता पत्रकारिता और न्यू मीडिया के क्षेत्र में हासिल की है। नेहा मिश्रा ने भोपाल से पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय भोपाल से न्यू मीडिया टेक्नोलॉजी में मास्टर्स किया है।

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